ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु एक विशेष प्रार्थना पढ़ते हैं जिसे ज़ियारतनामे कहा जाता है। यह प्रार्थना इमाम हुसैन (अस) के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए पढ़ी जाती है।
हे अल्लाह, मैं आपका दास हूँ, मैं आपके पास आया हूँ, मैं आपके लिए अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने आया हूँ, मैं आपके साथ जुड़ने और आपके प्रेम को व्यक्त करने आया हूँ।"
"अस्सलामु अलैका या अबू अब्दिल्लाह, अस्सलामु अलैका या حुसैन, अस्सलामु अलैका या खैर अन्नास, अस्सलामु अलैका या नूर अल्लाह, अस्सलामु अलैका या حجة الله, ziyarat e nahiya in hindi
उम्मीद है, यह लेख ज़ियारत ए नहिया के महत्व और इसके इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करने में मदद करेगा। यह लेख श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने के लिए प्रेरित करेगा।
ज़ियारत ए नहिया का इतिहास बहुत पुराना है। यह यात्रा इमाम हुसैन (अ) के शहीदी के बाद से ही शुरू हुई थी। उनके परिवार और साथियों ने उनकी याद में यह यात्रा शुरू की थी, जो आज भी जारी है। मैं आपका दास हूँ
अल्लाहुम्म इननी अना ज़ाइलुक, फअ्ज़ल ज़ियाराती, व अना आरीफु बिलवफा, लिय वलातुक।
ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु ज़ियारतनामे पढ़ते हैं। यहाँ एक हिंदी अनुवाद है: मैं आपके पास आया हूँ
ज़ियारतनामे में, श्रद्धालु इमाम हुसैन (अस) को संबोधित करते हैं और उनके प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं। यह प्रार्थना एक पवित्र और भावनात्मक अनुभव प्रदान करती है जो श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है।